ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त

ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त
कौन हो तुम बतलाओ
देर से कितनी दूर खड़ी हो
और करीब आ जाओ

सुबह पे जिस तरह, शाम का हो गुमार -
ज़ुल्फ़ों में एक चेहरा, कुछ ज़ाहिर कुछ निहार

धड़कनों ने सुनी, एक सदा पाओं की -
और दिल पे लहराई, आँचल की छाओं सी

मिल ही जाती हो तुम, मुझको हर मोड़ पे २
चल देती हो कितने, अफ़साने छोड़ के

फिर पुकारो मुझे, फिर मेरा नाम लो २
गिरता हूँ फिर अपनी, बाहों में थाम लो


Comments

Popular posts from this blog

गुम है किसी के प्यार में, दिल सुबह शाम

तू प्यार तू प्रीत तू चांद तू रात

माना जनाब ने पुकारा नहीं